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डॉ.भारद्वाज के.एस.की हर रचना में मिलता है नारी को सम्मान

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डॉ.भारद्वाज के.एस.
डॉ.भारद्वाज के.एस.की हर रचना में मिलता है नारी को सम्मान

डॉ.भारद्वाज के.एस.की हर रचना में मिलता है नारी को सम्मान

– हर्ष भारद्वाज –

नई दिल्ली ,आद्विक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उपन्यास ‘इश्क-ए-जिंदगी’ ऐसा उपन्यास है जिसमें नारी पात्रों की भरमार है. लेखक ने इस रचना में भी एक मजबूरन पथ-भ्रष्ट युवती का मार्ग-दर्शन कर के उसका घर बसवा दिया और एक भटके हुए युवक को नायिका के मुखारविंद से उपचार करवा कर उसके घर वापिस भेज दिया | उपन्यास ‘हीरामंडी’ भी एक ऐसी युवती के जीवन पर आधारित है जो हालातों से मजबूर होकर देह बाज़ार का हिस्सा बन गई थी फिर भी उसने लेखक जनित विवेक का प्रयोग करते हुए अपने आपको बाजार की वस्तु बनने से बचा लिया था. लेखक की कल्पना शक्ति उसकी उस वक्त मददगार होती है जब उसका सब कुछ लुटने वाला था |

डॉ भारद्वाज न केवल शैक्षिक लेखन बल्कि साहित्य सृजन में भी गहरी रूचि रखते हैं. आपका सबसे पहला उपन्यास ‘शाश्वत प्रेम’ है जो हिंदी एकादमी, दिल्ली से अनुमोदित हुआ था और प्रकाशित हो चुका है | बुज़ुर्ग कहा करते हैं कि बहनें, बेटियाँ और न केवल घर का उजाला होती हैं बल्कि घर में सुख और समृद्धि में वृद्धि भी उन्हीं के कारण हुआ करती है. बुजुर्गों का वही उपदेश लेखक के रोम रोम में रच बस गया था. पाठकों को वही विचार और संस्कार उनकी रचनाओं में मिलेंगे. षजान और क्षशाँक नामक पात्र उनके उपन्यासों में लेखक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो पतित से पतित नारी को सम्मान दिलाने की जुगत करते रहते हैं और पीड़िता को न्याय दिलाने का प्रयास करते रहते हैं. उनकी सभी रचनाओं में नारीवाद निरंतर छाया रहता है. लेखक ने उस नारी वर्ग पर भी खूब लिखा है जिस से समाज सख्त नफरत करता है. अंग्रेजों ने उनको बदनाम किया था, मगर अज्ञानतावश भारतीय भी उनको बदनाम करने लगे. वह वर्ग है तवायफों का. तवायफ शब्द अरबी के ‘तवाफ’ से निकला है जिसका अर्थ है गोल गोल घूमना. नृत्य के दौरान गोल गोल घूमने की क्रिया प्रमुख होती है, इस लिए अरबी में नर्तकी को तवायफ कहा गया |

तवायफ सम्मानित वर्ग हुआ करता था. धनी परिवार अपने बच्चों को तहजीब की शिक्षा लेने उनके पास भेजा करते थे. उस सम्मानित वर्ग के खिलाफ भारतीय समाज भी अंग्रेजों की साजिश में शामिल हो गया और उनको बदनाम कर डाला | दूसरी बात, पाठक खुद सोचें कि तवायफों को तवायफ बनाया किसने? हास्यास्पद बात यह है कि लड़कियों को जो समाज तवायफ बनाता है या तवायफ बनने के लिए मजबूर करता है, वही समाज अपनी ही कृति से नफरत करने लगता है | लेखक ने अपनी हर रचना में कोशिश की है कि नारी को वह सम्मान मिले जिसकी वह हकदार है. वे अपनी इस कोशिश में कितने सफल रहे कितने नहीं, यह पाठक, समीक्षक और शोधकर्ता ही तय कर सकेंगे | डॉ के एस भारद्वाज शिक्षा शास्त्र में पीएचडी, अंग्रेज़ी, समाजशास्त्र और शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा अंग्रेज़ी-शिक्षण एवं प्रशिक्षण-विकास में स्नातकोत्तर डिप्लोमा धारक है तथा भगवान परशुराम प्रशिक्षण महाविद्यालय गोहाना, हरियाणा के पूर्व प्राचार्य-निर्देशक है. वे शिक्षक प्रशिक्षण परिषद (हरियाणा चेप्टर) के उपाध्यक्ष रहे हैं |

उनकी साहित्यिक रचनाएँ निम्न हैं, शाश्वत प्रेम (उपन्यास), पृष्ठांगन में प्रणय उपवन (उपन्यास), समय के हस्ताक्षर (कविता), वीरांगना झलकारी बाई (नाटक), प्रारब्ध (कहानी), राह से भटकता पुरुष नारी विमर्श, तहजीब रक्षक वे कोठेवालियाँ (जीवनवृत), चंबल का शिक्षित बगावती (उपन्यास), राजकुमारी रूपमति (उपन्यास), चुप कर, अभी नहीं (उपन्यास), इश्क-ए-जिंदगी (उपन्यास), नहीं, नहीं, अब और अहिल्या नहीं (उपन्यास), 1857- झाँसी की वीरांगनाएं (नाटक), हीरा दे की कुर्बानी (ऐतिहासिक उपन्यास), 1947, कुछ कही, कुछ अनकही, मगर मरना मना (उपन्यास), हीरामंडी (उपन्यास). इनके अलावा 18 शैक्षिक रचनाएँ हैं जो प्रकाशित हो चुकी हैं. पाठकों को शुभ कामनायें. लेखक की अनेक रचनाओं और स्त्री विमर्श पर अनेक आलेख जैसे ‘पुरुष मानसिकता, जिम्मेवार कौन,’ ‘खुद तो डूबे हैं,’ आदि साहित्यिक पत्रिका गुंजन, इंदौर में प्रकाशित हो चुके हैं |

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