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राजनीति ने देश को अजब गजब चौराहे पर ला खड़ा किया है : डाक्टर बसंत गोयल

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डाक्टर बसंत गोयल
राजनीति ने देश को अजब गजब चौराहे पर ला खड़ा किया है : डाक्टर बसंत गोयल

राजनीति ने देश को अजब गजब चौराहे पर ला खड़ा किया है : डाक्टर बसंत गोयल

वैश्विक मंच पर भी देश की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है नई दिल्ली ( सी.पी.एन.न्यूज़ ) : जैसे-जैसे साल 2026 की शुरुआत हुई है, वैसे-वैसे देश की राजनीति में हलचल तेज होती जा रही है। चाय की दुकानों से लेकर ड्रॉइंग रूम तक, सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक, एक ही सवाल बार-बार सामने आ रहा है—अगर आज चुनाव हो जाएं तो देश की कमान किसके हाथ में होगी। यह सवाल केवल सत्ता का नहीं है, बल्कि देश की दिशा, सोच और भविष्य से जुड़ा हुआ है। यह कहना है प्रसिद्ध समाजसेवी तथा चिकित्साविद डॉ.बसंत गोयल का | डॉ.बसंत गोयल कहते हैं एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व है, जिसने पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति और शासन की शैली को पूरी तरह बदल दिया है।

विकास, राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक पहचान—इन सभी को केंद्र में रखकर आगे बढ़ती भारतीय जनता पार्टी का मॉडल आज भी चर्चा के केंद्र में है। दूसरी तरफ कांग्रेस और राहुल गांधी हैं, जो खुद को नए रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं और यह संदेश देना चाहते हैं कि विपक्ष अब पहले जैसा नहीं रहा। डॉ.गोयल कहते हैं पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कई ऐसे बदलाव देखे हैं, जिन्होंने आम नागरिक के जीवन को सीधे प्रभावित किया है। आर्थिक सुधारों से लेकर डिजिटल इंडिया तक, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास से लेकर आत्मनिर्भर भारत की सोच तक, सरकार के फैसलों ने समर्थकों और आलोचकों दोनों को जन्म दिया है। कोई इन फैसलों को ऐतिहासिक बताता है, तो कोई सवाल खड़े करता है। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है हर व्यक्ति की अपनी राय है। बसंत गोयल कहते हैं भारत आज सिर्फ घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है। वैश्विक मंच पर भी देश की भूमिका पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है।

अंतरराष्ट्रीय बैठकों में भारत की आवाज़ सुनी जा रही है, रक्षा और कूटनीति के क्षेत्र में आत्मविश्वास बढ़ा है और भारतीय संस्कृति तथा परंपराओं को एक नई पहचान मिली है। यह सब नेतृत्व से जुड़ा होता है, और यही कारण है कि चुनाव के समय नेतृत्व सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है। इस पृष्ठभूमि में यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि जनता वास्तव में क्या सोच रही है। कोई किताबी सर्वे, कोई टीवी चैनल का पैनल या कोई एजेंसी का आंकड़ा हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बता सकता। असली तस्वीर तब सामने आती है जब आम लोग खुलकर अपनी राय रखते हैं। इसलिए यह पहल सीधे जनता से पूछने की है—अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं, तो आप किसे चुनेंगे। बसंत गोयल कहते हैं यह कोई औपचारिक चुनाव नहीं है, न ही किसी पार्टी का आधिकारिक सर्वे।

यह एक विचारों का मंच है, जहां लोग बिना दबाव के अपनी पसंद जाहिर कर सकते हैं। जो लोग मानते हैं कि वर्तमान सरकार ने देश को स्थिरता, सुरक्षा और विकास की दिशा दी है, उनके लिए भाजपा एक स्वाभाविक विकल्प है। वहीं जो लोग बदलाव की बात करते हैं और विपक्ष को एक मौका देना चाहते हैं, वे कांग्रेस का नाम लेते हैं। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि चुनाव केवल चेहरे पर नहीं लड़े जाते, बल्कि नीतियों, इरादों और पिछले रिकॉर्ड पर लड़े जाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी का समर्थक वर्ग उनके फैसलों, उनके अनुशासन और उनकी स्पष्ट राष्ट्रवादी सोच को सराहता है। वहीं विपक्ष यह तर्क देता है कि लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है और सत्ता से सवाल पूछना भी उतना ही अहम है। डॉ.गोयल कहते हैं इस तरह की चर्चाओं में भावनाएं जल्दी भड़क सकती हैं, इसलिए यह जरूरी है कि बातचीत शालीनता और सम्मान के साथ हो। अलग राय रखना लोकतंत्र की ताकत है, न कि कमजोरी।

जब लोग एक-दूसरे की बात सुनते हैं और तर्क के साथ अपनी बात रखते हैं, तभी एक स्वस्थ राजनीतिक माहौल बनता है। इस मंच का उद्देश्य भी यही है—देश की नब्ज को समझना, न कि किसी को नीचा दिखाना।आज का भारत डिजिटल है, जागरूक है और सवाल पूछता है। सोशल मीडिया ने आम नागरिक को भी अपनी बात कहने का मंच दिया है। ऐसे में हर एक टिप्पणी, हर एक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है। हो सकता है कि आपकी लिखी एक लाइन किसी बड़े रुझान की ओर इशारा करे। हो सकता है कि यह चर्चा यह दिखाए कि देश किस दिशा में सोच रहा है। डॉ.गोयल कहते हैं इसलिए इस पहल को केवल एक पोस्ट न समझें, बल्कि इसे लोकतंत्र में भागीदारी का एक छोटा सा प्रयास मानें। अपने दोस्तों, परिवार और परिचितों के साथ इसे साझा करें, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी राय सामने रख सकें। जितनी ज्यादा आवाज़ें जुड़ेंगी, तस्वीर उतनी ही साफ होगी।

आखिरकार फैसला जनता का ही होता है। सत्ता किसी की स्थायी नहीं होती, लेकिन जनता का विश्वास वही जीतता है जो उसे सही दिशा दिखाता है। यह महा-सर्वे उसी विश्वास, उसी सोच और उसी भावना को समझने की एक कोशिश है। देखते हैं कि जनता का झुकाव किस ओर है और किसका पलड़ा भारी दिखाई देता है।

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