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Navratri celebration: गैस संकट के बीच दिखी अटूट आस्था: ईंटों के चूल्हों पर पका भंडारा,

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Navratri celebration: गैस संकट के बीच दिखी अटूट आस्था: ईंटों के चूल्हों पर पका भंडारा,

परंपरा और श्रद्धा की अनोखी मिसाल
– रविन्द्र कुमार –

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नई दिल्ली ,नवरात्रि के पावन पर्व पर अष्टमी का दिन पूरे शहर में आस्था, श्रद्धा और भक्ति के रंग में सराबोर नजर आया। एक ओर जहां मंदिरों में माता रानी के जयकारों से वातावरण गुंजायमान रहा, वहीं दूसरी ओर इस बार भंडारों में एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। गैस सिलेंडर की किल्लत के चलते आयोजकों ने आधुनिक संसाधनों के बजाय पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों का सहारा लिया, जिसने पूरे आयोजन को एक विशेष और यादगार स्वरूप दे दिया। सुबह होते ही शहर के विभिन्न मंदिरों, कॉलोनियों और धार्मिक स्थलों पर भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कन्या पूजन के साथ भंडारों का आयोजन पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ किया गया। हालांकि इस बार गैस संकट ने आयोजकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी, लेकिन माता रानी की सेवा के आगे यह कठिनाई भी छोटी साबित हुई। स्थिति को संभालते हुए आयोजकों ने तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था की और पुराने समय की तरह लकड़ी के चूल्हों को फिर से जीवंत कर दिया। जगह-जगह बड़े-बड़े कढ़ाहों में पूड़ी, आलू की सब्जी, काले चने और सूजी का हलवा लकड़ी की आंच पर तैयार किया गया। चूल्हों से उठता धुआं, जलती लकड़ियों की खुशबू और पकते प्रसाद की सुगंध ने माहौल को पूरी तरह भक्ति और परंपरा में रंग दिया। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह दृश्य वर्षों बाद देखने को मिला, जब आधुनिक सुविधाओं के बीच पुरानी परंपराएं फिर से जीवंत होती नजर आईं |

मानसरोवर पार्नेक निवासी बुजुर्ग कांग्रेस नेता मांगेराम भारद्वाज नें बताया कि पहले हर भंडारा इसी तरह लकड़ी के चूल्हों पर ही बनाया जाता था और उस समय के भोजन का स्वाद आज भी लोगों के मन में बसा हुआ है। भक्तों ने भी इस व्यवस्था की सराहना की। उनका कहना था कि गैस की कमी के बावजूद न तो भंडारों के आयोजन में कोई कमी आई और न ही प्रसाद के स्वाद में। बल्कि लकड़ी की आंच पर बने भोजन का स्वाद और भी लाजवाब और पारंपरिक लगा। इस दौरान सामाजिक सहयोग की भावना भी देखने को मिली। स्थानीय युवाओं और निवासियों ने मिलकर लकड़ी की व्यवस्था की, चूल्हे तैयार किए और भोजन बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और प्रसाद वितरण में योगदान दिया। शहर में यह आयोजन केवल भंडारा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आस्था, सहयोग, जुगाड़ और परंपरा के अद्भुत संगम का प्रतीक बन गया। आधुनिकता के इस दौर में जहां हर काम गैस और बिजली पर निर्भर हो गया है, वहां इस तरह का दृश्य लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने वाला साबित हुआ। कुल मिलाकर, अष्टमी का यह पर्व न केवल श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक बनकर उभरा, बल्कि इसने यह भी संदेश दिया कि जब बात माता रानी की सेवा और आस्था की हो, तो कोई भी संकट भक्तों के हौसले को डिगा नहीं सकता। गैस संकट के बीच लकड़ी के चूल्हों पर सजे ये भंडारे आने वाले समय में भी लोगों के लिए प्रेरणा और यादगार उदाहरण बनकर रहेंगे।

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