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Maharashtra Politics: आदित्य ठाकरे के लिए सीट छोड़ने वाले सुनील शिंदे भी बागी! उद्धव ठाकरे के सामने बढ़ा संकट

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Maharashtra Politics: आदित्य ठाकरे के लिए सीट छोड़ने वाले सुनील शिंदे भी बागी! उद्धव ठाकरे के सामने बढ़ा संकट

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में कभी मातोश्री का आदेश अंतिम माना जाता था, लेकिन अब शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। पार्टी में लगातार हो रही टूट ने ठाकरे परिवार की पकड़ और संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले चार वर्षों में दूसरी बार शिवसेना (यूबीटी) को बड़ा झटका लगा है।

साल 2022 में सत्ता और शिवसेना के विभाजन के बाद अब एक बार फिर उद्धव ठाकरे के सामने पार्टी को संभालने की चुनौती खड़ी हो गई है। हाल ही में शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने के बाद अब विधायकों को लेकर भी अटकलें तेज हो गई हैं। इससे उद्धव गुट के भीतर बेचैनी बढ़ गई है।

ठाकरे परिवार के लिए इस संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस नेता ने वर्ष 2019 में आदित्य ठाकरे के राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाने के लिए अपनी मजबूत सीट छोड़ दी थी, अब उसी नेता के बागी रुख को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यह केवल एक विधायक के रुख बदलने का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे ठाकरे परिवार के प्रति लंबे समय से चली आ रही निष्ठा में आई दरार के तौर पर देखा जा रहा है।

उद्धव ठाकरे ने हाल ही में विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों की बैठक बुलाई थी। इस बैठक में शिवसेना (यूबीटी) के तीन विधायक और एक एमएलसी शामिल नहीं हुए। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई कि क्या सांसदों के बाद अब विधायक भी उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ सकते हैं।

हालांकि, गैरहाजिर नेताओं ने पार्टी को पहले ही अपनी अनुपस्थिति की जानकारी दे दी थी। उन्होंने एमएलसी चुनाव, खराब स्वास्थ्य और निजी कारणों का हवाला दिया था। इसके बावजूद पार्टी के अंदर संभावित टूट को लेकर अटकलें जारी हैं। इनमें सबसे ज्यादा चर्चा एमएलसी सुनील शिंदे के नाम को लेकर हो रही है।

सुनील शिंदे वही नेता हैं जिन्होंने वर्ष 2019 में आदित्य ठाकरे के लिए अपनी वर्ली विधानसभा सीट छोड़ दी थी। उस समय इसे ठाकरे परिवार के प्रति उनकी मजबूत निष्ठा और पार्टी परंपरा का उदाहरण माना गया था। सुनील शिंदे वर्ष 2014 में वर्ली सीट से विधायक चुने गए थे और क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ थी।

जब आदित्य ठाकरे ने पहली बार चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो शिवसेना नेतृत्व ने उनके लिए वर्ली सीट को चुना। पार्टी के आदेश के बाद सुनील शिंदे ने बिना विरोध अपनी जीती हुई सीट आदित्य ठाकरे के लिए छोड़ दी। आदित्य ठाकरे ने 2019 में वर्ली से चुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया और 2024 में भी इसी सीट से विधायक बने।

उस समय सुनील शिंदे के फैसले को ठाकरे परिवार के प्रति समर्पण और शिवसेना की परंपरा से जोड़कर देखा गया था। लेकिन अब वही नेता उद्धव ठाकरे की अहम बैठक से दूर रहे, जिसके बाद उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

अगर सुनील शिंदे भी एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाते हैं तो यह उद्धव ठाकरे के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा। इससे यह संकेत मिलेगा कि पार्टी के भीतर असंतोष केवल नए नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने और भरोसेमंद नेताओं में भी नाराजगी बढ़ रही है।

फिलहाल उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने की है। महाराष्ट्र की राजनीति में आने वाले दिनों में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर होने वाली गतिविधियों पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

 

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