Home आमने सामने K S Bhardwaj: डॉ के. एस. भारद्वाज के साहित्य में नख शिख...

K S Bhardwaj: डॉ के. एस. भारद्वाज के साहित्य में नख शिख वर्णन

0
5

K S Bhardwaj: डॉ के. एस. भारद्वाज के साहित्य में नख शिख वर्णन
– हर्ष भारद्वाज –

नई दिल्ली , एशिया महाद्वीप के उपन्यासकार और कहानीकार अपनी रचनाओं में नायिका का ऐसा सुंदर किरदार गढ़ते पाए जाते हैं जैसे पूरी दुनिया में उस जैसी सुंदर और सुघड़ स्त्री और कोई हो नहीं सकती. जैसे झील सी गहरी आँखें, पतले पतले रसीले होठ, गुलाबी गाल, पतली कमर, उन्नत उरोज, स्वस्थ स्कंध और नितम्ब और सुराही जैसे लम्बी गर्दऐसी न की वह पानी भी पीये तो नीचे उतरता दिखे.
एक नजीर पेश है. रीतिकालीन शायर आलम ने नख शिख वर्णन हेतु एक शेर लिखना शुरू किया मगर एक पंक्ति लिख कर न जानें क्यों अधूरा छोड़ दिया। उस कागज को अपनी पगड़ी के छोर पर बांध दिया; शायद याह सोच कर कि कुछ विचार सूझेगा, तो वे पूरा कर लेंगे। उस एक पंक्ति का अवलोकन करें. “कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?”
संयोग ऐसा हुआ कि उन्होंने अपनी पगड़ी रंगने हेतु रंगरेजिन के पास भेज दी. इस प्रकार पगड़ी के छोर से बंधी कागज की वो पर्ची शेख रँगरेज़िन के पास पहुँच गईं. रंगरेज़िन ने पगड़ी में बंधी पर्ची को पढ़ा और उसने उत्तर दिया, “कटि को कंचन काटि विधि, कूचन मध्य धरि दीन.” यह उदाहरण प्रमाण है कि एशिया महाद्वीप नख शिख वर्णन को अपने साहित्य में बेतरीन तरजीह देता था जो अब भी जारी है. शुरू में हम भी इस प्रवृति के शिकार रहे.

जब लेखक ने अपना पहला उपन्यास, “शाश्वत प्रेम,” लिखा तो नायिका संभावना को विश्व सुन्दरी से कम नहीं दिखाया था. उसकी छवि को लेखक ने निन्म शब्दों में पिरोया था.“तीखे नयन नक्श की धनी, खूबसूरत सी, छरहरे मगर सवस्थ बदन वाली गौरवर्णा किशोरी,” यह उपन्यास हिंदी एकादमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत हुआ था. मगर दूसरे उपन्यास, “पार्श्वांग्न में प्रणय उपवन,” को प्रारम्भ करने से पूर्व लेखक का नज़रिया एक दम बदल चुका हित है क्योंकि नायिका का जो नख-शिख वर्णन उन्होंने “शाश्वत प्रेम” में किया था, वास्तविक संसार में वह असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है. लेखक का कहना है कि वे सोच रहे थे कि इस प्रकार के सभी गुण एक ही स्त्री में कैसे पाए जा सकते हैं? परिणाम यह हुआ कि उनके उपन्यास “पार्श्वांग्न में प्रणय उपवन” की नायिका चंचल के नयन, नख एवं शिख साधारण है और रंग-रूप में सांवली है.
लेखक अपने नज़रिए में यह बदलाव तो कर चुके थे, मगर पाठकों की रूचि के मुकाम पर आकर वे अटक गए थे. उनका कहना है कि उनके सम्मुख अब प्रश्न यह था कि साधारण रंग-रूप वाली नायिका को पसंद कौन करेगा? लेखक ने बताया कि उनके ज़हन में एक विचार कौंधा कि नायिका चंचल को पुरुषों के सम्मुख क्यों न खड़ा किया जाये? पुरुषों के सम्मुख खड़ा करने का अर्थ यह था कि नायिका को नायक से भी बहुत बड़ा साबित किया जाये. और लेखक ने वही किया. लेखक डॉ भारद्वाज कहते हैं कि उसके बाद तो वे पक्के नारीवादी हो गए. वैसे भी वे नारी उत्पीड़न के सख्त विरोधी रहे हैं. दूसरे उपन्यास के बाद तो उन्होंने अपनी सभी रचनाओं में नारी को उच्च स्थान दिया है.
पतित से पतित नारी को न्याय दिलाने का प्रयास किया है. “इश्क-ए-जिंदगी” में लेखक ने एक बाल-विधवा को दुराचारी जेठ से बचा कर पुनर्स्थापित किया है और एक काल-गर्ल को अपकर्मों से मुक्त करा कर उसे गृहस्थ जीवन उपलब्ध कराया है.
इसी प्रकार “बस, बस, अब और अहिल्या नहीं” में लेखक एक बलात्कार पीड़िता को न केवल न्याय दिलवाता है बल्कि उसका घर-संसार बसवा देता है. कुछ पाठकों और एक दो पत्रकारों ने नारीवाद को लेकर डॉ के एस भारद्वाज के साहित्य की समीक्षा अनेक बार की है और उसे सराहा है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here