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Shankaracharya Nishchalanand: संतों के साथ मारपीट और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़ना पूरी तरह गलत – शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती

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Shankaracharya Nishchalanand: संतों के साथ मारपीट और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़ना पूरी तरह गलत – शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती

गोवर्धनमठ के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती महाराज ने माघ मेले में अपने शिविर में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े विवाद पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने एक बार फिर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को अपना “लाडला” बताते हुए स्पष्ट कहा कि साधु-संतों के साथ किसी भी प्रकार की मारपीट करना और ब्रह्मचारियों की चोटियां पकड़कर उन्हें खींचना निंदनीय और पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि यह मर्यादा शंकराचार्य हों या कोई अन्य संत, सभी पर समान रूप से लागू होती है और सभी को स्नान की परंपरा और मर्यादा का पालन करना चाहिए।

मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान के दौरान शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई घटना को लेकर पूछे गए सवाल पर शंकराचार्य निश्चलानंद ने कहा कि कुंभ या माघ मेले में शंकराचार्य स्नान करें या न करें, इससे शासन तंत्र को कोई विशेष सरोकार नहीं होता। उन्होंने कहा कि प्रशासन का पूरा ध्यान मुख्य रूप से नागा साधुओं के स्नान पर केंद्रित रहता है, जबकि अन्य संतों और शंकराचार्यों के स्नान को लेकर अक्सर उतनी संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाती।

उन्होंने शंकराचार्य परंपरा को लेकर कहा कि जो भी किसी पीठ का प्रामाणिक शंकराचार्य होता है, उसे यह पूरा अधिकार है कि वह अपने उत्तराधिकारी का चयन स्वयं करे। इसमें किसी अन्य पीठ के शंकराचार्यों की अनुमति आवश्यक नहीं होती। यदि कोई शंकराचार्य बिना उत्तराधिकारी घोषित किए शरीर त्याग देता है, तो उस पीठ से संबद्ध विद्वत परिषद को यह अधिकार होता है कि वह विचार-विमर्श कर नए शंकराचार्य का चयन करे।

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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को लेकर संत समाज में मतभेद और बंटवारे के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनके अनुसार शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद ने अपने जीवनकाल में दो दंडी स्वामी बनाए थे, जो स्वयं को ज्योति मठ और द्वारका मठ का शंकराचार्य बताते थे। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद स्वयं यह बात कह चुके हैं कि उनका अभिषेक श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्य द्वारा किया गया था और द्वारका पीठ के शंकराचार्य उनके गुरु भाई हैं, ऐसे में उन्हें वहां से समर्थन मिलना स्वाभाविक है।

शंकराचार्य निश्चलानंद ने स्पष्ट किया कि जब तक यह पूरा प्रकरण उनके पास औपचारिक रूप से नहीं आता, तब तक किसी प्रकार का अंतिम निर्णय देना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यदि उन्होंने अभी कोई निर्णय दे दिया और बाद में न्यायालय का फैसला कुछ और आया, तो यह उनके पद और गरिमा के विपरीत होगा। इसलिए सभी को संयम, मर्यादा और परंपरा के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए।

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