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Dr KS Bhardwaj: मीराबाई भारत की प्रथम क्रांतिकारी थी जिन्होंने सामंतवाद के विरुद्ध आवाज उठाई थी: डॉ.के.एस.भारद्वाज

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Dr KS Bhardwaj: मीराबाई भारत की प्रथम क्रांतिकारी थी जिन्होंने सामंतवाद के विरुद्ध आवाज उठाई थी: डॉ.के.एस.भारद्वाज

नई दिल्ली ( हर्ष भारद्वाज ) : वरिष्ठ साहित्यकार पूर्व प्रधानाचार्य डॉ के एस भारद्वाज की सूक्ष्म नजर में मीराबाई भारत की प्रथम क्रांतिकारी थी जिन्होंने सामंतवाद के विरुद्ध आवाज उठाई थी, उसके अहं को तोड़ कर समाज में स्त्री के वजूद को स्वीकार करना सिखाया था और एक अछूत संत रविदास को अपना गुरु बना कर छूआछूत के विरुद्ध बिगुल फूँका था.ये वो समय था जब उच्च वर्ग के लोग दलितों के हाथ से पानी पीना तो दूर उनकी छाया तक से दूर रहते थे. ऐसे समय में मीराबाई ने रूढ़ियों के विरुद्ध बगावत की थी. उन्होंने अपने वैधव्य को सहर्ष स्वीकार किया था मगर उन ढ़कोसलों, कुरीतियों और रिवाजों को मानने से साफ इंकार कर दिया था जो विधवाओं पर लादे जाते थे. इतिहास कहता है कि राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का सबसे पहले विरोध किया था; मगर यह सरासर गलत है. सच तो यह है कि राजा राममोहन राय (मई 22, 1772 से सितंबर 27, 1833) से करीब दो शताब्दी पूर्व मीराबाई (1498-1547) ने न केवल सती होने से इंकार कर दिया था बल्कि बाल कटवाने से लेकर श्वेत वस्त्र धारण करने और धरती पर सोने से इंकार कर दिया था. मीराबाई के ऐसे क्रातिकारी कदमों की वजह से उनके देवर विक्रमादित्य सिंह जो उनके पति भोजराज सुपुत्र महाराणा सांगा, की मौत के बाद मेवाड़ के राणा बने थे, ने उनकी हत्या तक के अनेक प्रयत्न किये थे मगर हर बार वो असफल रहा. उसके बाद उनको तरह तरह की यातनाएं दी गई जिनके कारण उन्होंने अनेक प्रकार के कष्ट और लांछन झेलने पड़े थे क्योंकि पुरुष समाज को उनकी वह बगावत स्वीकार नहीं थी; फिर भी वे अपने निश्चयों पर अडिग रही थी. अंतत: मजबूर होकर उन्होंने राजमहल तक छोड़ना पड़ा था जिससे समाज को वे बता सकें कि आध्यात्म में क्या शक्ति है और नारी भी किसी पुरुष से कम नहीं. मीराबाई के आध्यात्मिक आत्मविश्वास का आलम यह था कि वे बड़े से बड़े संत से चर्चा करने से नहीं चूकती थी. ध्यातव्य है कि जब वे वृन्दावन पहुँची तो उन्होंने महान संत जीव गोस्वामी जो चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी थे, से मिलने की अनुमति मांगी.जीव गोस्वामी ने कहा कि पुरुष प्रकृति से नहीं मिला करते है. मीराबाई हँसी और कहा, “हमने तो सुना था कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र पुरुष हैं. ये एक और पुरुष कहाँ से आ गये?”जब जीव गोस्वामी ने मीराबाई की तीखी और सारगर्भित टिप्पणी सुनी तो वे बहुत लज्जित हुए, वे भागे भागे गए और मीराबाई के चरणों में लोट गए और कहा, “देवी, मेरे चक्षु खोलने के लिए आपका बहुत बहुत आभार.” मीराबाई ने कहा, “हे संत शिरोमणि! मुझ अकिंचन को पाप का भागी क्यों बनाते हैं? आपके सम्मुख तो मैं कण समान भी नहीं.”कहा जाता है कि इस पर दोनों संतों की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी. संतों के मौन संदेशों को संत ही जानें. नमन है ऐसे संतों को |

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