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North East Delhi Congress: उत्तर पूर्वी दिल्ली में ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों को नजरंदाज़,कर कांग्रेस नें खुद की अपनी राह मुश्किल

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North East Delhi Congress: उत्तर पूर्वी दिल्ली में ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों को नजरंदाज़,कर कांग्रेस नें खुद की अपनी राह मुश्किल
– अश्वनी भारद्वाज –

नई दिल्ली ,वैसे तो आप हैडलाइन पढकर ही पूरा माजरा समझ गए होंगे क्योंकि इसमें ही पूरी खबर का सार है लेकिन फिर भी चर्चा कर लेते हैं वरना लोग कहेंगे इतना कुछ होने पर भी नहीं लिखा गया | ऐसा नहीं है कि हम ब्राह्मण हैं इसलिए इसे मुद्दा बना रहे हैं बल्कि सियासी पार्टियाँ ही इस राह पर चलती है और कुछ हद तक उनकी मजबूरी भी होती है | यहाँ यह बताने की जरूरत नहीं कि उत्तर पूर्वी दिल्ली संसदीय क्षेत्र को ब्राह्मण बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है और भाजपा के मनोज तिवारी इसी खाते से यहाँ से अपनी जीत की हैट्रिक जमा चुके हैं उनके अलावा दिग्गज ब्राह्मण लाल बिहारी तिवारी भी यहाँ से जीत की हैट्रिक लगा चुके हैं वहीं कांग्रेस के संदीप दीक्षित भी इसी कोटे से विजय पताका फहरा चुके हैं अब तो आप समझ ही गए होंगे हमारे तर्क में कितना दम है | जहां तक मुस्लिम वर्ग का सवाल है संख्या के हिसाब से दूसरे बड़ी जमात उन्हीं की है जिसके दम पर गठ्बन्धन प्रत्याशी कन्हैया कुमार नें मजबूत लड़ाई लड़ी थी लेकिन अफ़सोस इस बात का है कांग्रेस नें इस लोकसभा के तहत आने वाले दोनों जिलों में से ना तो किसी ब्राह्मण को मौका दिया और ना ही किसी मुस्लिम को | इसे कहते हैं आ बैल मुझे मार |
जहां कांग्रेस के इस निर्णय से दूसरी पार्टियों को वाक् ओवर मिलता दिख रहा है वहीं यहाँ के ब्राह्मण समाज के साथ-साथ मुस्लिम वर्ग को भी हताशा ही हाथ लगी है | ऐसा नहीं है कि इस लोकसभा क्षेत्र के तहत पार्टी के पास सशक्त ब्राह्मण या मुस्लिम दावेदार नहीं थे बल्कि हम तो कहेगें लंबी कतार थी भीष्म शर्मा से लेकर डॉ.पी.के.मिश्रा ,स्व.रामबाबू शर्मा के पुत्र पूर्व विधायक विपिन शर्मा ,दीपक वशिष्ठ ,सुनील वशिष्ठ आदेश भारद्वाज श्रीष तिवारी सहित करीब आधा दर्जन और मजबूत चेहरे थे वहीं जहां तक मुस्लिम चेहरों का सवाल है विपरीत हालात में भी जीते हुए कम से कम तीन तो निगम पार्षद ही थे जिनमे हाजी जरीफ नें तो खुलकर दावेदारी भी की थी उनके अलावा भी अली मेहँदी सहित कई मजबूत नाम पार्टी के पास थे लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों नें ना मालुम कौन सा गणित अपनाते हुए बहुसंख्यक समुदायों को नजरंदाज़ करते हुए अपना निर्णय लिया | बनाये गए दोनों जिला अध्यक्ष क्या कर पायेगें यह मसला अलग है लेकिन राजनीति पुराने समय में भी समीकरणों से चलती थी और आज का समय तो बिना समीकरणों के फिट बैठ ही नहीं सकता | दूसरे शब्दों में बिना रणनीति के कामयाब राजनिति नहीं हुआ करती | पार्टी द्वारा बनाये गए सभी जिलाध्क्षों को हम अपनी तरफ से शुभकामनाएं देते है और उम्मीद करते हैं पार्टी नें उनपर जो भरोसा जताया है वे उस पर खरा उतरेगें | आज बस इतना ही …

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