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सम्मेद शिखर को लेकर देश में भूचाल

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जैनियों के सर्वोच्च तीर्थस्थल पारसनाथ पहाड़ी सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल के रूप में नोटिफाई किए जाने पर देश-विदेश में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है। सरकार के इस फैसले के विरोध में राजस्थान के सांगानेर में अनशन करते हुए जैन मुनि संजय सागर जी ने मंगलवार को देह त्याग दिया। इसके बाज जैन धर्मावलंबियों का आक्रोश और उबल पड़ा है। दूसरी तरफ इस विवाद पर सियासत भी तेज हो गई है। झारखंड में सरकार का नेतृत्व करने वाली पार्टी जेएमएम ने इस विवाद को भाजपा का ‘पाप’ करार दिया है तो दूसरी तरफ भाजपा का आरोप है कि झारखंड की मौजूदा सरकार की हठधर्मिता से लाखों-करोड़ों जैन धर्मावलंबियों की आस्था आहत हो रही है। आइए, समझते हैं सम्मेद शिखर की महत्ता क्या है, इस स्थान को लेकर उपजे विवाद की वजह और क्रोनोलॉजी क्या है और इस विवाद का हल किन तरीकों के निकल सकता है?

यह स्थान झारखंड के गिरिडीह जिले में है। भौगोलिक ²ष्टि से देखें तो यह झारखंड की सबसे ऊंची पहाड़ी है, जिसे सामान्यत: पारसनाथ पहाड़ी के नाम से जाना जाता है। इसकी ऊंचाई एक हजार 350 मीटर है। इसे झारखंड के हिमालय के रूप में जाना जाता है। दुनिया भर के जैन धर्मावलंबी इस पहाड़ी को श्री शिखर जी और सम्मेद शिखर के रूप में जानते हैं। यह उनका सर्वोच्च तीर्थ स्थल है। इस पहाड़ी की तराई में स्थित कस्बे को मधुवन के नाम से जाना जाता है। जैन धर्म में कुल 24 तीथर्ंकर (सर्वोच्च जैन गुरु) हुए। इनमें से 20 तीथर्ंकरों ने यहीं तपस्या करते हुए देह त्याग किया यानी निर्वाण या मोक्ष प्राप्त किया। इनमें 23वें तीथर्ंकर भगवान पाश्र्वनाथ भी थे। भगवान पाश्र्वनाथ की टोंक इस शिखर पर स्थित है। पाश्र्वनाथ का प्रतीक चिन्ह सर्प है। उन्हीं के नाम पर इस स्थान का नाम पारसनाथ भी है। यह ‘सिद्ध क्षेत्र’ कहलाता है और जैन धर्म में इसे तीर्थराज अर्थात ‘तीर्थों का राजा’ कहा जाता है। यहां हर साल लाखों जैन धर्मावलंबी आते हैं। वे मधुवन में स्थित मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ पहाड़ी की चोटी यानी शिखर पर वंदना करने पहुंचते हैं। मधुवन से शिखर यानी पहाड़ी की चोटी की यात्रा लगभग नौ किलोमीटर की है। जंगलों से घिरे पवित्र पर्वत के शिखर तक श्रद्धालु पैदल या डोली से जाते हैं।

 

केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पारसनाथ पहाड़ी के एक भाग को वन्य जीव अभयारण्य और इको सेंसेटिव जोन घोषित किया है, जबकि झारखंड सरकार ने अपनी पर्यटन नीति में इसे धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में चिन्हित किया है। जैन धर्मावलंबियों का कहना है कि पर्यटन स्थल घोषित होने से इस पूज्य स्थान की पवित्रता भंग होगी। यहां लोग पर्यटन की दृष्टि से आएंगे तो मांस भक्षण और मदिरा पान जैसी अनैतिक गतिविधियां बढ़ेंगी और इससे अहिंसक जैन समाज की भावना आहत होगी। इसलिए इसे तीर्थस्थल रहने दिया जाए। केंद्र और राज्य की सरकारों ने इसे पर्यटन स्थल घोषित करने का जो नोटिफिकेशन जारी किया है, उसे वापस लिया जाए। देश-विदेश में पिछले एक महीने के दौरान इस मांग को लेकर जैन धर्मावलंबियों के मौन प्रदर्शन का सिलसिला जारी है।

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