जंतर-मंतर से प्रदर्शन का अधिकार छीनना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ, फैसले पर हो पुनर्विचार: विपिन शर्मा
नई दिल्ली (रविंद्र कुमार): जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन के निर्धारित स्थलों की सूची से हटाए जाने के फैसले पर राजनीतिक विरोध तेज होने लगा है। इस निर्णय को लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने वाला कदम बताते हुए रोहताश नगर विधानसभा के पूर्व विधायक विपिन शर्मा ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा है और सरकार को जनता की आवाज सुनने के रास्ते बंद करने के बजाय उन्हें और मजबूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर लंबे समय से आम नागरिकों, सामाजिक संगठनों, कर्मचारी यूनियनों और राजनीतिक दलों के लिए अपनी मांगें सरकार तक पहुंचाने का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के नजदीक होने के कारण यहां होने वाले प्रदर्शनों के माध्यम से जनसमस्याएं सीधे सत्ता के सामने आती हैं। यदि प्रदर्शनकारियों को शहर से दूर निर्धारित स्थलों पर भेज दिया जाएगा, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उनकी आवाज सरकार और प्रशासन के शीर्ष स्तर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचेगी। विपिन शर्मा ने कहा कि लोकतंत्र में सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं और विरोध की आवाज को सुनना उनकी जिम्मेदारी है। यदि किसी स्थान पर प्रदर्शन के कारण यातायात, सुरक्षा या स्थानीय निवासियों को परेशानी होती है, तो उसका समाधान बेहतर प्रबंधन, समय-सीमा और स्पष्ट नियमों के जरिए किया जाना चाहिए, न कि उस स्थान को ही प्रदर्शन के लिए अनुपलब्ध कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर केवल धरना देने की जगह नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को सत्ता के सामने रखने का एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक माध्यम रहा है। सरकार को यह समझना चाहिए कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत है। विपिन शर्मा ने निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा कि जनता को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की आलोचना को विरोध या अव्यवस्था मानने के बजाय उसे जनभावनाओं को समझने का अवसर माना जाना चाहिए। यदि सरकार जनता की आवाज से दूरी बनाती है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर हो सकता है।



