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Marital Rape Case: शादी से खत्म नहीं होती व्यक्तिगत स्वायत्तता, वैवाहिक अपवाद की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

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Marital Rape Case: शादी से खत्म नहीं होती व्यक्तिगत स्वायत्तता, वैवाहिक अपवाद की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई

नई दिल्ली। वैवाहिक संबंधों में पत्नी की सहमति और व्यक्तिगत स्वायत्तता से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई की। शीर्ष अदालत भारतीय न्याय संहिता (BNS) में मौजूद उस वैवाहिक अपवाद की संवैधानिक वैधता की जांच कर रही है, जिसके तहत अपनी वयस्क पत्नी के साथ पति द्वारा किए गए गैर-सहमति वाले यौन संबंध को सामान्य परिस्थितियों में बलात्कार के अपराध के दायरे से बाहर रखा गया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शादी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता को समाप्त नहीं करती।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या विवाह के आधार पर पति को बलात्कार से संबंधित आपराधिक कानून में दी गई यह छूट संविधान में दिए गए समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे अधिकारों के अनुरूप है। अदालत ने इस बात पर विचार किया कि विवाह के बाद भी महिला का अपने शरीर और व्यक्तिगत निर्णयों पर अधिकार बना रहता है और वैवाहिक संबंध को व्यक्तिगत स्वायत्तता समाप्त होने के रूप में नहीं देखा जा सकता।

सुनवाई के दौरान पीठ ने वैवाहिक संबंध की प्रकृति और उसमें मौजूद अधिकारों तथा दायित्वों पर भी विचार किया। अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि विवाह दो व्यक्तियों के बीच एक कानूनी और सामाजिक संबंध है, लेकिन इससे किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पूरी तरह दूसरे के अधीन नहीं हो जाती। इसी संदर्भ में पत्नी की यौन सहमति और उसके शारीरिक अधिकारों का सवाल इस मामले के केंद्र में है।

मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बलात्कार से संबंधित प्रावधान के साथ एक वैवाहिक अपवाद मौजूद है। इसके तहत पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाए जाने को, पत्नी के वयस्क होने की स्थिति में, बलात्कार के अपराध के रूप में नहीं माना जाता। इसी अपवाद को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया है कि विवाह के आधार पर महिलाओं के बीच इस तरह का अंतर करना संविधान के समानता के अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के खिलाफ है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से इस बात पर जोर दिया गया कि किसी महिला की सहमति का महत्व विवाह के बाद समाप्त नहीं हो सकता। उनका तर्क है कि यदि विवाह के बाहर किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध अपराध है तो केवल विवाह होने के कारण उसी तरह के गैर-सहमति वाले कृत्य को अलग कानूनी संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। मामले में महिला की शारीरिक अखंडता, गरिमा, निजता और यौन स्वायत्तता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा भी उठाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस व्यापक प्रश्न को भी समझने की कोशिश की कि विवाह के भीतर सहमति को कानून किस प्रकार देखता है। अदालत की टिप्पणियों से यह महत्वपूर्ण पहलू सामने आया कि वैवाहिक रिश्ता स्थापित होने मात्र से किसी व्यक्ति की स्वतंत्र पहचान या अपने शरीर से संबंधित फैसले लेने की क्षमता समाप्त नहीं होती।

मामले में वैवाहिक संबंधों के भीतर उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। घरेलू हिंसा, क्रूरता और यौन दुर्व्यवहार जैसी परिस्थितियों में महिलाओं के पास अलग-अलग कानूनों के तहत कानूनी रास्ते मौजूद हैं। इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि जब कृत्य गैर-सहमति वाला हो तो उसे केवल विवाह के कारण बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर क्यों रखा जाए।

दूसरी ओर, वैवाहिक अपवाद को हटाने के संभावित सामाजिक और कानूनी प्रभावों को लेकर भी अदालत के सामने तर्क रखे जाते रहे हैं। इसमें विवाह संस्था, वैवाहिक विवादों और आपराधिक कानून के इस्तेमाल से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। केंद्र सरकार पूर्व में इस विषय पर यह रुख रख चुकी है कि वैवाहिक संबंधों में महिला की सहमति का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इसे बलात्कार के अपराध के समान मानने के व्यापक सामाजिक और कानूनी प्रभावों पर भी विचार जरूरी है।

इस मामले की पृष्ठभूमि दिल्ली हाईकोर्ट के एक विभाजित फैसले से भी जुड़ी है। वैवाहिक बलात्कार अपवाद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट के दो न्यायाधीशों ने अलग-अलग राय दी थी। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अब शीर्ष अदालत के सामने इस विवाद से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों का अंतिम समाधान करने की चुनौती है।

विवाद केवल आपराधिक कानून की किसी एक धारा तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध इस सवाल से है कि क्या विवाह के बाद महिला की यौन सहमति को वही कानूनी महत्व मिलना चाहिए जो विवाह के बाहर मिलता है। इसके साथ संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा व्यक्ति की गरिमा और निजता से जुड़े अधिकारों की व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

शीर्ष अदालत के सामने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विवाह अपने आप में निरंतर यौन सहमति का आधार माना जा सकता है या नहीं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सहमति किसी संबंध की स्थायी और अपरिवर्तनीय अनुमति नहीं हो सकती तथा व्यक्ति को किसी भी समय किसी यौन गतिविधि से इनकार करने का अधिकार होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी कारण महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारतीय न्याय व्यवस्था में निजता, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता को लेकर पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण फैसले आए हैं। वैवाहिक अपवाद की संवैधानिकता पर होने वाला फैसला इन सिद्धांतों को विवाह के भीतर यौन सहमति के सवाल पर लागू करने की दिशा तय कर सकता है।

इस मामले का फैसला भारतीय आपराधिक कानून पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट वैवाहिक अपवाद को असंवैधानिक मानता है तो विवाह के भीतर गैर-सहमति वाले यौन संबंधों को लेकर मौजूदा कानूनी व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है। वहीं यदि अदालत मौजूदा अपवाद को बरकरार रखती है तो यह भी स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि विवाह के भीतर महिला की शारीरिक और यौन स्वायत्तता की सुरक्षा किस कानूनी व्यवस्था के जरिए सुनिश्चित की जाएगी।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट इस संवेदनशील मामले में अलग-अलग पक्षों की दलीलों पर विचार कर रहा है। अदालत का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है। इसलिए सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जा सकता। लेकिन शादी से व्यक्तिगत स्वायत्तता समाप्त नहीं होने संबंधी अदालत की टिप्पणी ने वैवाहिक संबंधों में सहमति, गरिमा और शारीरिक अधिकारों को लेकर चल रही कानूनी बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

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