1984 Sikh Massacre: कांग्रेस नेतृत्व 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ित परिवारों से माफी मांगे : डॉ. गुरमीत सिंह सूरा
1984 के सिख नरसंहार के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने, उनके दर्द और संघर्ष को आवाज देने तथा कांग्रेस नेतृत्व की जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर दिल्ली भाजपा और विभिन्न सिख संगठनों की ओर से विशाल विरोध पदयात्रा निकाली गई। इस दौरान दिल्ली भाजपा के प्रदेश मंत्री एवं अल्पसंख्यक मोर्चा के सह-प्रभारी डॉ. गुरमीत सिंह सूरा ने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधते हुए कहा कि 1984 का सिख नरसंहार भारतीय इतिहास का बेहद पीड़ादायक और दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है। इस हिंसा में हजारों निर्दोष सिखों की जान गई, अनेक परिवार उजड़ गए और अनगिनत लोगों का जीवन हमेशा के लिए बदल गया।
डॉ. गुरमीत सिंह सूरा ने कहा कि घटना को दशकों बीत जाने के बावजूद पीड़ित परिवारों के दिलों में उस भयावह दौर के जख्म आज भी ताजा हैं। उन्होंने कहा कि जब वर्ष 1984 में दिल्ली की सड़कों पर निर्दोष सिखों का नरसंहार हुआ, उस समय देश में कांग्रेस की सरकार थी। जिन लोगों पर देश की सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा की जिम्मेदारी थी, उस दौर की हिंसा को लेकर आज भी गंभीर सवाल मौजूद हैं। कांग्रेस नेतृत्व को इन सवालों से बचने के बजाय पीड़ित परिवारों के प्रति अपनी जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए।

उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि 1 नवंबर जैसे संवेदनशील दिन पर रामलीला मैदान में कांग्रेस की रैली आयोजित की जा रही है, जबकि यह तारीख वर्ष 1984 की हिंसा की भयावह यादों से जुड़ी हुई है। ऐसे दिन कांग्रेस नेतृत्व को सिख समाज की भावनाओं और उन परिवारों के दर्द का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जिन्होंने उस नरसंहार में अपने प्रियजनों को खोया था।
डॉ. सूरा ने सवाल किया कि राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व आखिर 1984 के पीड़ित परिवारों की पीड़ा पर कब जवाब देंगे? जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, जिन माताओं ने अपने बेटे खोए और जिन बच्चों का बचपन उस हिंसा की वजह से छिन गया, उनके दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, संविधान और मानवाधिकारों की बात करने वाले कांग्रेस नेताओं को 1984 के पीड़ितों के सवालों का भी जवाब देना चाहिए।
डॉ. गुरमीत सिंह सूरा ने स्पष्ट रूप से कहा कि कांग्रेस नेतृत्व को 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ित परिवारों से माफी मांगनी चाहिए। उनके अनुसार, केवल राजनीतिक मंचों से संवेदनशीलता और मानवाधिकारों की बातें करने से जिम्मेदारी पूरी नहीं होती। पीड़ित परिवारों को न्याय और सम्मान मिलने के साथ-साथ उनकी पीड़ा को उचित पहचान दी जानी चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि यह विरोध पदयात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि उन परिवारों के दर्द और न्याय की मांग को सामने लाने का प्रयास है, जिनकी आवाज वर्षों तक अनसुनी रही। वर्ष 1984 के जख्मों को भुलाया नहीं जा सकता और न ही पीड़ित परिवारों के लंबे संघर्ष को नजरअंदाज किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इन परिवारों को न्याय दिलाने और उनकी आवाज को मजबूती से उठाने के लिए जवाबदेही की मांग जारी रहनी चाहिए।





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