दिल्ली में प्रदूषण का कहर जारी नहीं सुधर पा रहे हालात : परमानन्द शर्मा
लोगों का सांस लेना होता जा रहा है मुहाल
नई दिल्ली ( सी.पी.एन.न्यूज़ ) : राजधानी दिल्ली में प्रदूषण के हालात सुधरने का नाम नहीं ले रहे | आलम यह है की ट्रिपल इंजन सरकार लगातार यह कह रही है जल्द ही हालात नियन्त्रण में कर लिए जाएंगे लेकिन हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ते दिख रहे है | यह कहना है राम नगर वार्ड से कांग्रेस के पूर्व निगम प्रत्याशी परमानन्द शर्मा का | परमानन्द शर्मा कहते हैं जिस तरह से पूरा मानसून निकल गया था लेकिन ट्रिपल इंजन सरकार जलभराव नहीं रोक सकी थी उसी तरह दीपावली के बाद से प्रदूष्ण के हालात से निपटने में नाकाम रही है दिल्ली की ट्रिपल इंजन की सरकार |
परमानन्द शर्मा कहते हैं दिल्ली में इन दिनों हल्की ठंडी जरूर हो गई है. लेकिन लगातार बढ़ती ठंड में राजधानी के लोगों का सांस लेना मुहाल होता जा रहा है. दिल्ली में मंगलवार को तो हालात इतने खराब रहे कि शहर का औसत एक्यूआई 400 के पार पहुंच गया है. सुबह राजधानी का औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 405 दर्ज किया गया, जिसे गंभीर श्रेणी में माना जाता है | इसका मतलब है कि हवा में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक हो चुका है और इससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है खासतौर से बच्चे और बुजुर्ग इसकी चपेट में आ रहे है |

परमानन्द शर्मा कहते हैं गंभीर श्रेणी की हवा में लंबे समय तक रहने से सांस की बीमारियां, आंखों में जलन, और हृदय संबंधी दिक्कतें और बढ़ रही हैं. बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों को घर से बाहर निकलने से बचने की सलाह दी गई है. दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने के पीछे पराली जलाने, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसम में बदलाव को जिम्मेदार माना जा रहा है. हवा की गति धीमी होने से प्रदूषक कण वातावरण में फंस गए हैं | परमानन्द शर्मा कहते हैं ट्रिपल इंजन की सरकार भी पिछली आम आदमी पार्टी की सरकार की तरह केवल हवाबाजी करती नजर आती है जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये जाते | परमानन्द शर्मा कहते हैं सुबह से रात तक देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर की हवा का हाल अब लगभग एक जैसा ही रहने लगा है लोग परेशान है घरो के भीतर दुबककर रहना अब लोगो की दिनचर्या बन चुकी है | लेकिन काम धंधे वाले लोग ऐसा भी नहीं कर सकते |
आमतौर पर जो प्रदूषण सुबह के वक्त ज्यादा दिखता था, वह दोपहर में कुछ हद तक कम हो जाता था और फिर शाम ढलते-ढलते दोबारा बढ़ जाता था. लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं. लेकिन अब हवा में वह उतार-चढ़ाव नहीं दिखा, जो पहले रोजमर्रा की बात हुआ करता था |



