India Oil Imports: ईरान संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर मंडराया खतरा, पर वैकल्पिक तेल स्रोत तैयार
अमेरिका द्वारा ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों पर किए गए हमलों के बाद खाड़ी क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस सैन्य कार्रवाई के चलते अब यह आशंका और तेज हो गई है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है — एक ऐसा रणनीतिक जलमार्ग, जिससे होकर दुनिया के एक तिहाई से अधिक समुद्री तेल का परिवहन होता है। भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर चिंताजनक है क्योंकि देश के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर आता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ईरान होर्मुज को बंद करता है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गहरा असर पड़ेगा। तेल की कीमतों में तेजी से उछाल आ सकता है और भारत जैसे आयात-आधारित ऊर्जा उपभोक्ताओं को बड़ा झटका लग सकता है। हालांकि, भारत ने इस संकट से निपटने के लिए पहले से ही कई वैकल्पिक उपाय सुनिश्चित कर रखे हैं।
उद्योग से जुड़े विश्लेषकों और अधिकारियों का कहना है कि भारत के पास कई अन्य देशों से तेल आपूर्ति के विकल्प मौजूद हैं। रूस से आने वाला कच्चा तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते से नहीं आता, बल्कि वह स्वेज नहर, केप ऑफ गुड होप और प्रशांत महासागर जैसे वैकल्पिक मार्गों से पहुंचता है। इसके अलावा अमेरिका, ब्राजील और पश्चिम अफ्रीका जैसे देश भी भारत को आवश्यकतानुसार तेल आपूर्ति कर सकते हैं, हालांकि वहां से आयात कुछ महंगा जरूर होगा।
कतर, जो भारत का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, भी होर्मुज जलडमरूमध्य से बचकर आपूर्ति करता है। इस कारण कतर से प्राकृतिक गैस या कच्चा तेल आने में किसी तरह की बाधा की संभावना फिलहाल नहीं दिख रही है।
तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के मामले में भारत की स्थिति और भी मजबूत है। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और रूस से आने वाली एलएनजी की आपूर्ति पर होर्मुज संकट का कोई सीधा असर नहीं होगा। यह सुनिश्चित करता है कि घरेलू गैस उत्पादन, बिजली संयंत्रों और औद्योगिक आपूर्ति पर कोई बड़ा संकट फिलहाल नहीं आएगा।
हालांकि सरकार और ऊर्जा मंत्रालय स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। रणनीतिक तेल भंडारों को सक्रिय करने और कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए संभावित कदमों पर भी विचार हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को अस्थायी रूप से भी बंद किया जाता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन पूरी आपूर्ति ठप नहीं होगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि भारत बीते कुछ वर्षों से अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविधीकृत करने की नीति पर काम कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता बढ़ाई, जिससे उसे रियायती दरों पर तेल मिल सका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का प्रभाव सीमित रहा।
अब जब खाड़ी क्षेत्र में नया संकट सिर उठा रहा है, भारत के सामने फिर से वही प्रश्न है — क्या देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर अधिक गंभीर प्रयास करेगा, या फिर वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर ही निर्भर बना रहेगा।



