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पहले प्रक्रिया सही और पारदर्शी थी तो अब विशेष अभियान की जरूरत क्यों पड़ी : आदेश भारद्वाज

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आदेश भारद्वाज

पहले प्रक्रिया सही और पारदर्शी थी तो अब विशेष अभियान की जरूरत क्यों पड़ी : आदेश भारद्वाज

नई दिल्ली ( स्पर्श भारद्वाज ) : चुनाव आयोग और SIR प्रक्रिया पर इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष देवेंद्र यादव का कहना है कि इंडिया गठबंधन ने 2 से 8 अक्टूबर तक देशभर में ‘लोकतंत्र बचाओ मार्च’ शुरू करने का फैसला किया है। 6 अक्टूबर को सांसद चुनाव आयोग तक मार्च करेंगे और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली होगी। कांग्रेस लोकतंत्र की हत्या नहीं होने दे सकती। इस मामले पर करावल नगर कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष आदेश भारद्वाज ने भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज कराई। जिसका आज तक चुनाव आयोग द्वारा खंडन ना किया जाना भी पुष्टि करता है कि चुनाव आयोग और बीजेपी की मिली भगत से वोट चोरी की जा रही थे। साथ ही इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के आने के बाद चुनाव आयोग द्वारा नियमावली में बदलाव करने से यह तो स्पष्ट हो गया कि यह पूरी प्रक्रिया में बड़ी गड़बड़ियां तो हैं। क्योंकि अगर सब कुछ सही था तो BLO को घर-घर जाकर दस्तावेज लेने का निर्देश क्यों जारी करना पड़ा? दिल्ली में दावे-आपत्ति की तारीख 30 अक्टूबर और निपटान 30 नवंबर तक क्यों बढ़ानी पड़ी? क्या यह स्वीकारोक्ति नहीं कि पहले की प्रक्रिया में लाखों मतदाताओं को परेशान किया गया? आदेश भारद्वाज ने दूसरे राज्यों को लेकर टिप्पणी करते हुए कह कि आयोग ने जहां SIR पूरा हो चुका है, वहां उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छूटे मतदाताओं के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। जिसके तहत हर BLO को हफ्ते में 20-25 मतदाताओं का लक्ष्य दिया गया है। तो सवाल उठता है कि अगर पहले प्रक्रिया सही और पारदर्शी थी तो अब विशेष अभियान की जरूरत क्यों पड़ी? आंध्र प्रदेश और मेघालय में फाइनल रोल की तारीख बढ़ाने का फैसला क्या कांग्रेस या अन्य दलों के दबाव का नतीजा है? यही नहीं देशभर में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाने वाली प्रक्रिया पर जब आयोग के दो-तिहाई सदस्य बार-बार आपत्ति दर्ज करा रहे हों, तो जनता कैसे भरोसा करे? सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित है। ज्ञानेश कुमार को जवाब देना होगा कि कैबिनेट सचिव तक चिट्ठी लिखने के बावजूद “सर्वसम्मति” का दावा कैसे टिकता है? इसलिए हम ज्ञानेश कुमार के साथ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के इस्तीफे की भी मांग करते हैं और इस पूरी प्रक्रिया के रोल बैक की मांग करते हैं।

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