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Javelin Missile Deal: भारत खरीदेगा अमेरिका की घातक जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल, दुश्मन के टैंकों के खिलाफ बढ़ेगी सेना की ताकत

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Javelin Missile Deal: भारत खरीदेगा अमेरिका की घातक जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल, दुश्मन के टैंकों के खिलाफ बढ़ेगी सेना की ताकत

नई दिल्ली। भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में भारत ने अमेरिका से अत्याधुनिक जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। भारतीय सेना ने शुक्रवार को अमेरिकी फॉरेन मिलिट्री सेल्स यानी FMS प्रक्रिया के तहत हथियार प्रणाली की खरीद के लिए लेटर ऑफ ऑफर एंड एक्सेप्टेंस (LoA) पर हस्ताक्षर किए। जेवलिन एक मैन-पोर्टेबल, फायर-एंड-फॉरगेट एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम है, जिसे बख्तरबंद वाहनों और मजबूत सैन्य ठिकानों के खिलाफ इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया गया है।

अमेरिका ने भारतीय सेना के इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। अमेरिकी पक्ष के मुताबिक, यह कदम भारत और अमेरिका की सेनाओं के बीच लगातार मजबूत होते रक्षा सहयोग को दर्शाता है।

अमेरिकी दूतावास ने कहा कि यह हस्ताक्षर भारत-अमेरिका मेजर डिफेंस पार्टनरशिप को और मजबूत करता है। इसके साथ ही दोनों देशों के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने के लिए भविष्य में आपसी लाभ वाले को-प्रोडक्शन और अन्य सहयोग की संभावनाओं पर बातचीत का रास्ता भी खुल सकता है।

भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी इस समझौते को दोनों देशों के रक्षा संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक, भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी लगातार गहरी, अधिक सक्षम और प्रभावी होती जा रही है। इससे दोनों देशों के रक्षा उद्योगों को साथ मिलकर काम करने के नए अवसर मिलने की संभावना है।

जेवलिन मिसाइल सिस्टम को लेकर भारत और अमेरिका के बीच पिछले काफी समय से बातचीत चल रही थी। भारत इस हथियार प्रणाली में कई वर्षों से दिलचस्पी दिखाता रहा है। खासतौर पर आधुनिक युद्धक्षेत्र में टैंकों और अन्य बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ इसकी क्षमता इसे भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।

इससे पहले मई में अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भारत के साथ जेवलिन हथियार प्रणाली के उत्पादन से जुड़े सहयोग की प्रतिबद्धता की बात कही थी। उन्होंने इसे दोनों देशों की सेनाओं की सामूहिक तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया था।

जेवलिन सिस्टम की खरीद भविष्य में भारत में इसके संभावित सह-उत्पादन का रास्ता भी खोल सकती है। दोनों देशों के बीच इस दिशा में बातचीत आगे बढ़ने पर भारतीय रक्षा उद्योग को अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक और उत्पादन से जुड़े नए अवसर मिल सकते हैं।

इससे पहले अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी संकेत दिया था कि भारत जेवलिन सिस्टम से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर करने के करीब है। उन्होंने इसे भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों में एक बड़ा कदम बताते हुए कहा था कि इससे उत्पादन सहयोग की नई संभावनाएं पैदा होंगी।

जेवलिन सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषताओं में इसका ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ सिस्टम शामिल है। इसका अर्थ है कि मिसाइल लॉन्च करने के बाद ऑपरेटर को लगातार लक्ष्य को निर्देशित करने की जरूरत नहीं पड़ती। मिसाइल अपने गाइडेंस सिस्टम के जरिए लक्ष्य की ओर बढ़ती है।

युद्ध के मैदान में यह क्षमता सैनिकों के लिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि मिसाइल दागने के बाद वे अपनी स्थिति बदल सकते हैं। इससे दुश्मन की जवाबी कार्रवाई के दौरान सैनिकों के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।

जेवलिन को मैन-पोर्टेबल सिस्टम के रूप में भी विकसित किया गया है। यानी सैनिक इसे युद्ध क्षेत्र में अपने साथ ले जाकर जरूरत के अनुसार तैनात कर सकते हैं। भारी लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम होने से इसे अलग-अलग परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

जेवलिन को विशेष रूप से टैंकों और अन्य बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है। इसके अलावा इसे मजबूत सैन्य ठिकानों और अन्य चुनिंदा लक्ष्यों के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस मिसाइल सिस्टम को RTX और लॉकहीड मार्टिन की साझेदारी वाले Javelin Joint Venture ने विकसित किया है। अमेरिकी सेना और मरीन कॉर्प्स लंबे समय से इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य देशों की सेनाओं के पास भी जेवलिन सिस्टम मौजूद है।

यूक्रेन युद्ध के दौरान भी जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल काफी चर्चा में रही है। युद्धक्षेत्र में बख्तरबंद वाहनों के खिलाफ इसके इस्तेमाल ने दुनिया भर में इस श्रेणी के पोर्टेबल एंटी-टैंक हथियारों के महत्व को और बढ़ाया है।

भारत की ओर से जेवलिन सिस्टम हासिल करने की योजना को सेना के एंटी-टैंक हथियारों के आधुनिकीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है। पहाड़ी और मैदानी दोनों तरह के क्षेत्रों में आधुनिक टैंकों से मुकाबले के लिए पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

पहले सामने आई खरीद योजना में अतिरिक्त 25 जेवलिन लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स यानी LwCLU अथवा जेवलिन ब्लॉक-1 कमांड लॉन्च यूनिट और उससे संबंधित उपकरण शामिल बताए गए थे। इसकी अनुमानित कीमत करीब 45.7 मिलियन डॉलर बताई गई थी।

कमांड लॉन्च यूनिट जेवलिन सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके माध्यम से ऑपरेटर लक्ष्य की पहचान और मिसाइल लॉन्च करने की प्रक्रिया को पूरा करता है। हल्के कमांड लॉन्च सिस्टम से सैनिकों के लिए इसे युद्धक्षेत्र में ले जाना और तैनात करना अधिक सुविधाजनक होता है।

भारत पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका से कई महत्वपूर्ण सैन्य प्लेटफॉर्म और हथियार प्रणालियों की खरीद कर चुका है या उनकी खरीद प्रक्रिया पर आगे बढ़ा है। दोनों देशों के बीच रक्षा व्यापार के साथ तकनीक, उत्पादन और सैन्य अभ्यास के स्तर पर भी सहयोग लगातार बढ़ा है।

जेवलिन के अलावा भारत की अन्य अमेरिकी रक्षा प्रणालियों में भी रुचि रही है। इनमें 216 M982A1 एक्सकैलिबर टैक्टिकल प्रोजेक्टाइल से संबंधित खरीद भी शामिल है। एक्सकैलिबर एक सटीक निशाना लगाने में सक्षम गाइडेड आर्टिलरी गोला है।

भारतीय नौसेना के लिए अतिरिक्त छह Boeing P-8I समुद्री निगरानी और पनडुब्बी रोधी युद्धक विमान हासिल करने की योजना भी भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के महत्वपूर्ण प्रस्तावों में शामिल रही है। P-8I पहले से भारतीय नौसेना की समुद्री निगरानी क्षमताओं का अहम हिस्सा है।

जेवलिन मिसाइल सिस्टम को शामिल करने से भारतीय सेना को आधुनिक और पोर्टेबल एंटी-टैंक हथियार का अतिरिक्त विकल्प मिलेगा। खासतौर पर इसकी फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता सैनिकों को मिसाइल लॉन्च करने के बाद तेजी से अपनी पोजीशन बदलने की सुविधा देती है।

इस समझौते का महत्व केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं माना जा रहा है। अमेरिका की ओर से भविष्य में को-प्रोडक्शन और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया गया है। यदि इस दिशा में आगे समझौते होते हैं तो भारत में रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग को भी बढ़ावा मिल सकता है।

जेवलिन सिस्टम से जुड़ा यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत अपनी सेनाओं के आधुनिकीकरण और स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर लगातार जोर दे रहा है। अब इस खरीद के साथ भविष्य में संभावित संयुक्त उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर होने वाली बातचीत पर भी नजर रहेगी।

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