Justice Yashwant Varma: कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा दोषी करार, शीतकालीन सत्र में आ सकता है महाभियोग प्रस्ताव
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कथित कैश कांड में गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने उन्हें दोषी पाया है। समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करते हुए जस्टिस वर्मा के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। रिपोर्ट सामने आने के बाद अब उनके खिलाफ आगे की संवैधानिक और कानूनी कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
सरकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ आगामी शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। हालांकि, इस संभावित प्रस्ताव को लेकर कई संवैधानिक सवाल भी उठ रहे हैं, क्योंकि जस्टिस वर्मा अप्रैल में ही राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा भेज चुके हैं।
महाभियोग प्रस्ताव की संभावित प्रक्रिया को लेकर सूत्रों का कहना है कि अगर संसद में उनके खिलाफ प्रस्ताव लाया जाता है तो जस्टिस वर्मा को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंप चुके किसी न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है या नहीं।
जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम अभी भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सूची में शामिल बताया जा रहा है। इसी वजह से उनके इस्तीफे की स्थिति और संसद में उनके खिलाफ संभावित कार्रवाई को लेकर संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच बहस शुरू हो गई है।
इस मामले में वर्ष 1978 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा दिए गए एक फैसले का भी उल्लेख किया जा रहा है। उस फैसले में कहा गया था कि न्यायाधीश द्वारा इस्तीफा सौंपे जाने के बाद वह प्रभावी हो जाता है और उसके लिए किसी औपचारिक स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। इसी कानूनी स्थिति के आधार पर यह सवाल उठ रहा है कि यदि इस्तीफा प्रभावी हो चुका है तो क्या उसके बाद संबंधित न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
जस्टिस वर्मा से जुड़ा पूरा मामला उस समय सामने आया था, जब दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में उनके सरकारी आवास में आग लगने की घटना के दौरान कथित तौर पर बड़ी मात्रा में जला हुआ कैश बरामद होने की बात सामने आई थी। घटना के बाद न्यायपालिका के स्तर पर इस मामले को गंभीरता से लिया गया और जांच की प्रक्रिया शुरू हुई।
घटना के बाद जस्टिस वर्मा की भूमिका और उनके सरकारी आवास से बरामद कथित नकदी को लेकर कई सवाल उठे। इसके बाद उनके खिलाफ आंतरिक जांच और आगे की कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ। सूत्रों के अनुसार, उस समय उन्हें इस्तीफा देने के लिए भी कहा गया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समिति ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले से जुड़े तथ्यों की जांच की। अब समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश कर दी है। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही ठहराते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि जस्टिस वर्मा के मामले में अगला कदम क्या होगा। यदि सरकार शीतकालीन सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला करती है, तो संसद में इस पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।
संभावित महाभियोग प्रस्ताव की स्थिति में जस्टिस वर्मा को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने की बात भी सामने आई है। हालांकि, प्रस्ताव की वास्तविक प्रक्रिया और उसके प्रभाव को लेकर अंतिम स्थिति संसद में कार्रवाई और संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर निर्भर करेगी।
इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ जांच समिति की रिपोर्ट और कार्रवाई की सिफारिश है, वहीं दूसरी ओर जस्टिस वर्मा के पहले ही राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने का संवैधानिक पहलू है। यही कारण है कि अब इस मामले में सिर्फ कथित कैश कांड ही नहीं, बल्कि न्यायाधीश के इस्तीफे के बाद महाभियोग की संवैधानिक वैधता भी चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है।
फिलहाल सरकारी सूत्रों के मुताबिक शीतकालीन सत्र में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, अंतिम फैसला सरकार और संसद की आगामी कार्रवाई पर निर्भर करेगा।



