Iran Cyber Warfare: अमेरिकी सैनिकों की लोकेशन ट्रैक करने के लिए ईरान ने मोबाइल नेटवर्क का किया इस्तेमाल? रिपोर्ट में बड़ा दावा
वॉशिंगटन, 14 जुलाई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक खोजी रिपोर्ट ने कथित साइबर जासूसी को लेकर बड़ा दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से जुड़े तत्वों ने मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सैन्य कर्मियों और उनके कॉन्ट्रैक्टर्स की लोकेशन का पता लगाने के लिए मोबाइल नेटवर्क, ग्लोबल रोमिंग सिस्टम और स्मार्टफोन विज्ञापन डेटा का कथित तौर पर इस्तेमाल किया। इस खुलासे के बाद अमेरिकी सांसदों और रक्षा अधिकारियों के बीच चिंता बढ़ गई है और साइबर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह कथित निगरानी अभियान अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ से कुछ सप्ताह पहले शुरू हुआ था। दावा किया गया है कि इसके बाद भी, जब ईरान ने क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, तब भी यह निगरानी अभियान जारी रहा।
बताया गया है कि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने उपलब्ध तकनीकी डेटा का विश्लेषण करने के बाद कहा कि यह कोई सामान्य या अनियमित गतिविधि नहीं थी, बल्कि विशेष मोबाइल डिवाइसों की सटीक लोकेशन का पता लगाने के उद्देश्य से चलाया गया एक सुनियोजित अभियान प्रतीत होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कथित तौर पर अमेरिकी सैनिकों और रक्षा ठेकेदारों के मोबाइल उपकरणों को निशाना बनाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र के कुछ अधिकारियों का मानना है कि ईरानी मोबाइल ऑपरेटरों ने अन्य देशों के दूरसंचार नेटवर्क के साथ हुए रोमिंग समझौतों का कथित दुरुपयोग करते हुए SS7 (सिग्नलिंग सिस्टम-7) तकनीक के माध्यम से मोबाइल नेटवर्क पर लोकेशन संबंधी अनुरोध भेजे। SS7 दूरसंचार नेटवर्क में इस्तेमाल होने वाला एक पुराना प्रोटोकॉल है, जिसकी सुरक्षा संबंधी कमजोरियों को लेकर पहले भी विशेषज्ञ चिंता जताते रहे हैं।
इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि ईरान से जुड़े हैकर्स ने व्यावसायिक रूप से उपलब्ध स्मार्टफोन विज्ञापन डेटा का भी कथित तौर पर उपयोग किया। आधुनिक मोबाइल विज्ञापन तकनीक उपयोगकर्ताओं की लोकेशन के आधार पर विज्ञापन दिखाने के लिए लगातार लोकेशन डेटा एकत्र करती है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ परिस्थितियों में यह डेटा व्यावसायिक माध्यमों से खरीदा या प्राप्त किया जा सकता है।
रिपोर्ट में एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से दावा किया गया है कि ईरान समर्थित तत्वों ने इराक के कुर्दिस्तान क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों और उन होटलों की लोकेशन ट्रैक करने के लिए इसी प्रकार के विज्ञापन डेटा का उपयोग किया, जहां अमेरिकी अधिकारी ठहरे हुए थे। हालांकि इन दावों पर आधिकारिक रूप से सार्वजनिक पुष्टि नहीं की गई है।
साइबर सुरक्षा अनुसंधान संस्था सिटिजन लैब के वरिष्ठ शोधकर्ता गैरी मिलर ने रिपोर्ट में कहा कि ईरान के पास वास्तविक समय में लोकेशन संबंधी जानकारी प्राप्त करने की क्षमता मौजूद हो सकती है। उनके अनुसार यदि किसी देश के पास मोबाइल नेटवर्क की कमजोरियों और लोकेशन डेटा तक पहुंच हो, तो वह विशिष्ट उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों की निगरानी करने का प्रयास कर सकता है।
इस खुलासे के बाद अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संभावित जोखिमों को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि ग्लोबल रोमिंग सिस्टम और स्मार्टफोन विज्ञापन उद्योग से जुड़े तकनीकी लूपहोल्स का दुरुपयोग सैन्य कर्मियों की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। कई सांसदों ने इन प्रणालियों की सुरक्षा की समीक्षा करने और संवेदनशील सरकारी व सैन्य कर्मचारियों के लिए मोबाइल उपकरणों के उपयोग संबंधी नियमों को और सख्त बनाने की मांग की है।
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब केवल मिसाइलों और हथियारों तक सीमित नहीं रह गया है। डिजिटल तकनीक, डेटा संग्रह, मोबाइल नेटवर्क और साइबर जासूसी भी आज की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में सैन्य और सरकारी संस्थानों के लिए डिजिटल सुरक्षा को मजबूत करना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।



